अर्र की आवाज़ आई घोंसला बिखर गया,
तिनका-तिनका उड़ के जाने किस डगर गया.
चूजे को संभाले गौरैया भी गिरी धम्म से
आसमान के ख्वाब जमींदोज हुए झम्म से.
फिर वक़्त की हवा चली तो धूल जख्म पाट गई,
पर इंसानी आरी एक पेड़ काट गई.
Thursday, April 2, 2009
Sunday, March 29, 2009
prarambh
ब्लाग की दुनिया में मैं आज अपना स्वागत खुद कर रहा हूँ. स्पष्ट रूप से यह मेरी पहली पोस्ट है. यह मंच पिछ्ले काफ़ी समय से मुझे आसीन होनेके लिए प्रेरित करता रहा है. तकनीकी रूप से भयानक जदोज़्हद के बाद आख़िरकार रात के 10 बज मैने सफलता पा ली है. वजह भी बताता चलूँ कि बचपने में गणित में कमजोर रहा, किशोर हुआ तो कंप्यूटर्स ने तंग किया. साइन्स की जगह आर्ट्स में दाखिला लिया. फिर एक रात सपने में अकबर इलहाबादी नामक एक आदमी आया और कहा ---खीचों न कामानों को ना तलवार निकालो, गर तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो..
तब से आज तक मैने कुछ ऐसा पढा जो गुणा, जोड़, घटाने से परे रहा और कुछ ऐसा ही बेहिसाब सा लिखा...
तब से आज तक मैने कुछ ऐसा पढा जो गुणा, जोड़, घटाने से परे रहा और कुछ ऐसा ही बेहिसाब सा लिखा...
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